KOBAYASHI MITABI

भदंत आर्य नागार्जुन सुरेई ससाई
— जीवन-वृत्तांत

CHRONOLOGY

1935

जापान के ओकायामा प्रांत के नीइमि नगर, सुगो गाँव के बेस्शो में जन्म। मूल नाम — ससाई मिनोरु।

1945

द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति। गाँव की दीवारों पर “युद्ध हारना अच्छा हुआ” लिखने पर गाँव के युवा-दल द्वारा पीटे गए।

1948

पहाड़ों में लगी चोट के कारण दो वर्षों तक बीमार रहे। एक तपस्वी की सलाह पर लाल आँखों वाले साँप का हृदय खाकर स्वस्थ हुए।

1951

तोक्यो आगमन। शोसेइ चिकित्सालय में प्रशिक्षु बने और आसाकुसा के एक रुई-व्यापारी की दुकान पर कार्य किया। साथी लोगों के स्वदेश लौट जाने के बाद जड़ी-बूटियाँ बेचने का प्रयास किया।

योनागो हिगाशी हाईस्कूल के रात्रि-विभाग में प्रवेश। बार-बार घर छोड़कर देश भर में भटकते रहे; स्त्री-संबंधी कठिनाइयों से व्यथित होकर अनेक बार आत्महत्या का प्रयास किया।

1959

संन्यास लेना चाहा, परंतु किसी भी संप्रदाय के प्रमुख मठ ने प्रवेश नहीं दिया। यामानाशी के दाइबोसात्सु दर्रे पर आत्महत्या का प्रयास किया, किंतु पर्वत से उतर आए।

कात्सुनुमा के दाइज़ेन-जी मंदिर के द्वार पर मूर्छित होकर गिर पड़े।

1960

दाइज़ेन-जी के इनोउए शुयू के परिचय से, माउंट ताकाओ स्थित याकुओ-इन के महंत यामामोतो शुजुन के समीप दीक्षा ली। धर्म-नाम “शुरेई” (秀嶺) प्राप्त हुआ।

विभिन्न स्थानों पर पैदल यात्रा कर ज़ेन तथा निचिरेन संप्रदायों के मठों में भी साधना की।

समाचार-पत्र वितरण करते हुए ताइशो विश्वविद्यालय में श्रोता-छात्र के रूप में बौद्ध संप्रदायों की शिक्षाओं का अध्ययन किया। इसी काल में पारंपरिक रोक्योकु गाथाओं तथा फलित-शास्त्र का भी अनुशीलन किया।

1965

यामामोतो शुजुन की प्रेरणा से थाईलैंड की यात्रा। वाट पाक्नाम मंदिर में पाक्नाम-ध्यान-पद्धति का अभ्यास किया।

1967

स्त्री-संबंधी कठिनाइयों से पुनः व्यथित होकर थाईलैंड से भारत पहुँचे।

राजगीर में निप्पोनज़ान-म्योहोजि के याग्यि तेन्शो के नेतृत्व में ताहोज़ान स्तूप के निर्माण-कार्य में सहयोग दिया।

1968

ताहोज़ान पर बोधिसत्त्व नागार्जुन का दिव्य-दर्शन प्राप्त हुआ; नागपुर के लिए प्रस्थान किया।

1969

नागपुर में अपना पहला विहार स्थापित किया।

1970

मुंबई के सिद्धार्थ कॉलेज में डॉ. भीमराव अंबेडकर के कार्य-विषय पर शोध किया।

डॉ. अंबेडकर की अस्थियों का एक अंश नागपुर में प्रतिष्ठित किया।

इसी काल में एक गुफा में पंद्रह दिन का निर्जल-अनशन सम्पन्न किया; तत्पश्चात दो वर्षों तक उनकी वाणी मौन रही।

1976

नागार्जुन से जुड़े स्थानों की खोज में सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया। अनेक बौद्ध सम्मेलनों में सम्मिलित होकर प्रमुख आचार्य के रूप में नेतृत्व प्रदान किया।

1979

बोध गया स्थित महाबोधि मंदिर के वज्रासन के निकट आठ दिनों का अनशन सम्पन्न किया।

1982

उनके गुरु महंत यामामोतो शुजुन ने पहली बार नागपुर की यात्रा की।

1984

वीज़ा की अवधि समाप्त होने पर निर्वासन का आदेश प्राप्त हुआ।

1987

अवैध निवास के आरोप में अल्पकाल के लिए गिरफ्तार। नागपुर में “समस्त-नागरिक सुरेई ससाई संरक्षण समिति” का गठन हुआ।

एक माह के भीतर छह लाख हस्ताक्षर एकत्रित हुए। नागरिकता प्रदान करने की स्वीकृति मिली।

1988

प्रधानमंत्री राजीव गांधी से भारतीय नागरिकता प्राप्त की। भारतीय नाम — आर्य नागार्जुन।

1992

बोध गया महाबोधि मंदिर के प्रबंधन-अधिकार की पुनः-प्राप्ति हेतु संघर्ष आरंभ किया।

तब से यह आंदोलन दर्जनों चरणों में आगे बढ़ा है, और वर्तमान में प्रबंधन-कानून के संशोधन हेतु न्यायालय में चल रहा है।

इसी काल में मानसेल तथा सिरपुर के पुरातात्त्विक स्थलों का सर्वेक्षण किया, भूमि अधिग्रहीत कर उत्खनन कराया।

1994

अंबेडकर अंतर्राष्ट्रीय शांति पुरस्कार से सम्मानित।

2002

स्विट्ज़रलैंड के जिनेवा जाकर बोध गया प्रबंधन के विषय में संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त को निवेदन प्रस्तुत किया।

महाबोधि मंदिर यूनेस्को विश्व-धरोहर सूची में सम्मिलित किया गया।

2003

केंद्र सरकार के राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग में बौद्ध समुदाय के प्रतिनिधि-सदस्य नियुक्त। (तीन वर्ष की अवधि)

2006

डॉ. अंबेडकर के धर्मांतरण की पचासवीं वर्षगाँठ (स्वर्ण-जयंती) के मुख्य आचार्य के रूप में नेतृत्व किया।

2009

चौवालीस वर्षों के पश्चात पहली बार जापान लौटे।

2010

नागपुर के निकट नागार्जुन-महाविहार की स्थापना; प्रतिष्ठा-समारोह सम्पन्न किया।

2011

पूर्वी जापान के महाभूकंप तथा फुकुशिमा परमाणु दुर्घटना के पश्चात पुनः जापान लौटे; तोहोकु क्षेत्र के आपदाग्रस्त स्थलों की सूत्र-पाठ-यात्रा सम्पन्न की।

2014

स्वास्थ्य बिगड़ने पर एक समय गंभीर अवस्था में रहे, किंतु पुनः स्वस्थ हो गए। नांतेनकाई संस्था की स्थापना हुई।

2016

अंबेडकर अंतर्राष्ट्रीय संघ के अध्यक्ष पद ग्रहण किए तथा दीक्षा-भूमि (धर्मांतरण-स्थल) के अध्यक्ष बने।

संकलन — साएकी र्यूकाइ